«हे चरणो, वृन्दावन चलो! हे नेत्रो, इस सौन्दर्य को निहारो! हे जिह्वे, इसकी महिमा गाओ! हे देह, इसी धूल में प्रेम-विह्वल होकर लोटो!»





«मैं समस्त देवों का आत्मा हूँ, और इस वृन्दावन-वन को कभी नहीं छोड़ता। यहीं मैं युग-युग में प्रकट होता और अन्तर्धान होता हूँ»


